Saturday, February 5, 2011

रोके जा सकते हैं भूकंप !

आज मैं एक ऐसे विषय पर लिखने जा रहा हूं जिस पर यदि अमल कर लिया जाए तो भूकंप जैसी त्रासदी को नियंत्रित किया जा सकता है। मैं बात कर रहा हूं उस झटके की जिसने हम सभी को हिलाकर रख दिया था...फिजिकली भी और दिमाग़ी तौर पर भी... 


मैं आफिस से 18 जनवरी की रात को चलकर तक़रीबन 1.30 बजे घर पहुंचा...हाथ पैर धोकर सोने जा ही रहा था कि ऊपर पंखा झूलने लगा। नीचे बैड हिलने लगा। सभी को घबराहट में जगाया। मैं खुद भी  घबराया हुआ था। अक्सर देखा गया है कि एक बड़े भूकंप के कुछ देर बाद भूकंप का दूसरा झटका भी आता है....लेकिन ऐसा हुआ नहीं।


क्या अब नहीं आएंगे भूकंप ?

इस भूकंप के झटके के बाद मुझे फिर से उस वैज्ञानिक की याद आ गई...जिसने भूकंप को हमेशा के लिए खत्म करने का सिद्धांत दिया था और अपने सिद्धांत को समझाने के लिए एक-एक चैनल, एक-एक अखबार के न जाने कितने चक्कर लगाए। सभी ने केवल नेताओं वाले आश्वासन के अलावा कुछ नहीं दिया। इसके बाद मैंने अपने चार वैज्ञानिक मित्रों से इस पर काम करने का आग्रह किया...जिसमें से दो भौतिक वैज्ञानिक इस काम में लग चुके हैं।

ये विचार अपने आप में क्रांतिकारी लगता है कि भूकंप की विनाशलीला मचाने वाली ताक़त को निर्माण की ताक़त में तब्दील किया जा सकता है। ऐसा हो तो दुनिया को इस अनजाने खतरे से हमेशा के लिए बचाया जा सकता है। क्या ऐसा हो सकता है ? नई तरह के जियोफिजिकल अध्ययन इस तरफ इशारा करते हैं। और उनके दावे के मुताबिक कुछ चीजें कर ली जाएं तो विनाश मचाने वाले भूकंप बिजली देने लग सकते हैं। 

जियोथर्मल एनर्जी यानी भूतापीय ऊर्जा एक ऐसी हक़ीक़त है जिसे यदि किसी तरह से जकड़ लिया जाए तो देश में भूकंप से होने वाली तबाही को खत्म किया जा सकता है। भूतापीय ऊर्जा, मजलब ज़मीन के नीचे पैदा होकर इक्ट्ठा होने वाली एक ऐसी ताक़त है, जिसे यदि सही दिशा न मिले तो वो मनमाने ढंग से तबाही मचाने का काम करती है।


विज्ञान खुद को रोज़ एक नए तरीके से पेश करता है। मानवता का भला करना उसके एजेंडे में सबसे ऊपर होता है, लेकिन उसके इस्तेमाल करने वालों की नीयत से ही उसकी दिशा तय होती है। और कभी-कभी उसे विनाश का हथियार बनाकर उसका बदरंग चेहरा ही समाज के सामने रखने का काम किया जाता है।

अब भूकंप की ही बात लीजिए, अब तक इससे बचने के ही उपायों पर बातें होती रही हैं...लेकिन भूकंप के आने को ही रोका जा सकता है। और उसकी ताक़त से बिजली तक बनाई जा सकती है। ऐसा कभी सामने नहीं आया...इस क्रांतिकारी विचार को कभी भी वैज्ञानिक तरीकों से रखा ही नहीं गया। लेकिन एक स्वतंत्र वैज्ञानिक ने जब इस विचार को रखा तो उसका उत्साह बढ़ाने की बजाय चारों तरफ से उसकी टांग खिचाई होने लगी।

जियोथर्मल एनर्जी के इस्तेमाल को कभी भूकंप से लड़ने संदर्भो से जोड़कर देखा ही नहीं गया। ये सही है कि कुछ विचार को कभी गंभीरता से लिया ही नहीं गया। लेकिन भूकंप जिस तरह की तबाही मचाता है और उसके बाद जो अफरातफरी मचती है। भूकंप के मंजर को देखकर कोई भी वैज्ञानिक विचलित न हो - ये कैसे हो सकता है ? यही विचलित कर देने वाली बात आज भी कई वैज्ञानिकों के मन में आती है, लेकिन उचित सहयोग न मिलने की वजह से रिसर्च आगे ही नहीं बढ़ पाती है। जो कि बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है...लेकिन ये ज्यादा दिन यूं ही चलने वाला नहीं है।

अब जब हम बात करते हैं दिल्ली में आने वाले भूकंप की.... यहां के संभावित विनाश को सोचकर भी रुह कांप जाती है। दिल्ली में आने वाले संभावित विनाशकारी भूकंपों का केंद्र हरियाणा के सोहना जियोथर्मल क्षेत्र में है। यदि उस जगह पर हीट एक्सचेंजर लगा दिया जाए तो उससे जहां उससे जहां 20 मेगावॉट से ज्यादा बिजली बनाई जा सकती है वहीं भूतापीय ऊर्जा के इस दोहन से राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र को विनाशकारी भूकंपों से भी बचाया जा सकता है। 

''सोहना में गर्म पानी के सोते जगह-जगह हैं''
इतना पढ़ने के बाद ही आपके मन में आने लगा होगा कि क्या भूकंपों को दुनिया में कहीं रोका जा सका है ? क्या भूकंप के लिए जिम्मेदार ऊर्जा को किसी भी तरह बिजली में तब्दील किया जा रहा है ? क्या ऐसा कोई उदाहरण दुनिया में मौजूद है ? जहां भूतापीय ऊर्जा से बिजली बनाई जा रही हो।


अब आपको उस इलाके का मुआयना भी करा देते हैं जहां पर इस तरह का प्रयोग कामयाबी से चल रहा है। अमेरिका के उत्तरी कैलिफोर्निया में इस तरह का प्लांट काम कर रहा है। यहां का बिग गीज़र्स साल 1984 से 1800 मेगावॉट बिजली बना रहा है। जो कि दुनिया का सबसे बड़ा जियोथर्मल एनर्जी हार्नेस प्लांट है। जबसे उत्तरी कैलिफॉर्निया के इस प्लांट ने काम करना शुरु किया है तभी से बिग गीजर्स पॉकेट में रिक्टर स्केल पर 5 डिग्री से बड़े भूकंप आने बंद हो गए हैं और छोटे भूकंपों से ऊर्जा निकलनी वक्त के साथ-साथ कम होती गई है।

कैलिफॉर्निया-जहां भूतापीय ऊर्जा से बनाई जा रही है बिजली
जो भूतापीय ऊर्जा कभी विनाशकारी भूकंपों के लिए जिम्मेदार हुआ करती थी, वही आज दस लाख घरों में बिजली के रुप में बह रही है। यानी कभी तबाही का दूसरा नाम रही ये भूतापीय ऊर्जा आज विकास के काम आ रही है।


आखिर भूकंप हैं क्या हैं ? 
दरअसल भूकंप की वजह धरती के गर्भ से लगातार निकल रही नाभिकीय गर्मी है। धरती की नाभि में नाभिकीय विखंडन की सबसे पहले खोज अमेरिका के जॉन मार्विन हर्नडन 1993 में की थी। इस तरह की जानकारी अथर्व वेद के भूमि सूक्त में भी बताई जाती है।  गौरतलब है कि धरती की नाभि में आठ किलोमीटर व्यास में यूरेनियम और प्लूटोनियम का अथाह भंडार है। इसके विखंडन से प्रति से सेकंड चार टेरावॉट ऊर्जा पैदा होती है। ये ऊर्जा दुनिया के 1343 सक्रिय ज्वालामुखियों के मुंह से लावा के रुप में बाहर निकलती है। अर्थ क्रस्ट यानी धरती के कवच का ऊपरी हिस्से की 46 छोटी-बड़ी प्लेटें इसी ऊर्जा से गति प्राप्त करती हैं। दुनिया में क़रीब 50 हज़ार गर्म पानी के चश्मों को यहीं से ऊर्जा मिलती है। अंदर की गर्मी ही धरती पर जीवन का प्रमुख आधार है। यदि ये ऊर्जा न हो तो धरती पर इतनी ठंड पड़ती कि यहां पर जीवन मुमकिन ही नहीं हो पाता।


आपको बता दूं कि हरियाणा के सोहना जियोथर्मल एरिया, जो कि धरती के नीचे हज़ारों वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। जहां गर्म पानी का एक विशाल भंडार मौजूद है जो कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में आने वाले भूकंपों के लिए शाक्तिशाली बॉम्ब ब्लास्ट का काम करता है। यदि इस जगह पर हीट एक्सचेंजर और हीट पंप लगाकर यहां से भूतापीय ऊर्जा को खींच लिया जाए, तो जहां एक ओर हम विनाशकारी भूकंपों से बच पाएंगे, वहीं उससे बिजली भी बना पाएंगे। साथ ही स्पेस कंडीशनिंग भी कर सकेंगे। 

सीस्मोलॉजिस्ट यानी भूकंप वैज्ञानिक जनता को भूकंप की पूर्व जानकारी देने में आज भी नाक़ाम हैं। आखिर क्यों कोई भूकंप की पूर्व जानकारी देने का तरीक़ा अभी तक ईजाद नहीं कर पाया ? क्यों पुराने तरीकों से ही भूकंपों की व्याख्या करने को मजबूर किया जाता है ? क्यों नए विचार को सिरे से नाकार देने के लिए वैज्ञानिक अपनी ताक़त झोंक देते हैं ? भूकंप को समझने का जो मॉडल या तरीका अभी तक अपनाया गया है, क्या वो किसी भी तरीके से भारत में आने वाले भूकंपों को व्यक्त कर पाने में कामयाब हो पा रहा है क्यों नहीं अभी तक भूकंप की भविष्यवाणी मुमकिन हो पाई है ?



भूकंप की पुरानी व्याख्या
क्यों नहीं सीस्मोलॉजिस्ट आज तक जनता को भूकंप की पहले से जानकारी नहीं दे पाते ? आखिर वो क्या वजह हैं जो वैज्ञानिकों को भूकंप की पूर्व जानकारी देने में आड़े आ रही है ?  
दरअसल भारतीय भूकंपों को जिस मॉडल से परिभाषित किए जाने की कोशिश की जाती रही है, उसी में बुनियादी गड़बड़ी है। गौरतलब है कि भारत में आने वाले भूकंपों को इलास्टिक रिबाउंड मॉडल के आधार पर महज मैकेनिकल एनर्जी रिलीज इवेंट बताया जाता है। जबकि ये मॉडल सेन एन्ड्रियास फॉल्ट पर तो लागू होता है लेकिन भारत में पैदा होने वाले भूकंपों पर ये लागू ही नहीं होता।
इलास्टिक रिबाउंड मॉडल
भारत में पैदा होने वाले भूकंपों का एपीसेंटर यानी अभिकेंद्र हिमालयन प्लेट बाउंड्री से हज़ारों किलोमीटर दूर आंध्र-प्रदेश के भद्राचलम और महाराष्ट्र के लातूर, किल्लारी, कोयना में क्यों मौजूद है ? इसकी व्यख्या करने में इलास्टिक रिबाउंड मॉडल पूरी तरह से नाक़ाम है।
इसी तरह एक सवाल और भी उठता है कि हिमालयन प्लेट बाउंड्री से महज 200 किलोमीटर दूरी पर मौजूद लखनऊ, अयोध्या, फैज़ाबाद, इलाहाबाद और काशी में पिछले 3000 सालों में किसी विनाशकारी भूकंप का केंद्र क्यों नहीं पाया गया ? जबकि 1000 किलोमीटर से ज्यादा दूर मौजूद आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और मध्य प्रदेश में विनाशकारी भूकंपों के केंद्र पिछले सालों में ही मिल जाते हैं। क्या विज्ञान में नए विचारों या सवालों का जवाब नहीं दिया जाना चाहिए ? क्यों उन्हें उससे भागने की जरुरत है ? क्यों नए विचारों पर विचार करने की बजाए उसी को रोकने की कोशिश की जानी चाहिए ? भूकंप किसी की व्यक्तिगत समस्या तो है नहीं कि उस पर विचार करने का एकाधिकार किसी खास को ही होना चाहिए, यदि किसी नए विचार से भूकंप जैसी तबाही से बचा जा सकता है तो क्यों नीं उसका स्वागत किया जाना चाहिए ?

कैसे बन सकती है भूतापीय ऊर्जा से बिजली ?
भूतापीय ऊर्जा से बनाई जा सकती है बिजली और रोके जा सकते हैं भूकंप। इस विचार ने जहां पश्चिमी देशों को इससे निपटने के लिए सही क़दम उठाने का हौंसला दिया है। वहीं भारत में इसके लिए किसी भी तरह का उत्साह नहीं दिखाया गया है। जबकि 2001 में भुज का विनाशलीला ने हज़ारों घरों को जिंदा कब्रगाह में तब्दील कर दिया था। और न जाने कितने भूकंपों ने कितनों को बेमौत अपने आगोश में ले लिया है। क्यों नहीं इस तरह के विचार को अमली जामा पहनाने के लिए सरकार कुछ करती है?


भूकंप मैकेनिकल एनर्जी रिलीज है या जियोथर्मल एनर्जी रिलीज ?

भूकंप को लेकर एक नई तरह की बहस छिडी हुई है। आखिर भूकंपों को मैकेनिकल एनर्जी रिलीज घटना कहा जाए या फिर उस जियोथर्मल एनर्जी रिलीज कहा जाए ? बीती और इस शताब्दी में धरती को लेकर कई तरह के शोध हो चुके हैं। जिसमें सबसे बड़ा नाम अमेरिका के जॉन मार्विन हर्नडन का आता है। जिन्होंने 1993 में धरती की नाभि में होने वाले नाभिकीय विखंडन को सबसे पहले दुनिया के सामने रखा। इस विखंडन के जरिए धरती की भारी ऊर्जा बाहर निकलती है। अब इस ऊर्जा को किस तरह मैकेनिकल ऊर्जा कहा जा सकता है


क्यों नहीं हो सकता जियोथर्मल एनर्जी का इस्तेमाल ?
यही है जियोथर्मल एनर्जी यानी भूतापीय ऊर्जा। अब सवाल उठता है कि कोई ऊर्जा है तो फिर उसका इस्तेमाल क्यों नहीं हो सकता क्या जियोथर्मल एनर्जी को हीट एक्सचेंजर और हीट पंप लगाकर भूकंप, सूनामी और ज्वालामुखियों की त्रासदी को विकास में नहीं बदला जा सकते ?


भारत में सात भूतापीय ज़ोन...
 1) हिमालयन-जिसमें आते है जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार-नेपाल बॉर्डर, उत्तर पूर्वी बैरन द्वीप और अंडमान निकोबार द्वीप समूह।
2) सोहना- हरियाणा सहित राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र
3) खंबात-गुजरात
4) सोनाटा-मध्य प्रदेश
5) कोंकण-लातूर, किल्लारी, कोयना, महाराष्ट्र
6) गोदावरी-भद्राचलम सहित आंध्र प्रदेश के इलाके
7) महानदी- उड़ीसा

क्या भारत के इन सातों भूतापीय इलाकों से 10600 मेगावॉट बिजली बनाकर पूरे देश को भूकंप, सुनामी और ज्वालामुखी से मुक्ति नहीं दिलाई जा सकती ?  

सीस्मिक ज़ोन मैप-क्यों नहीं होते दुरुस्त
भारत के सीस्मिक ज़ोन मैप यानी भूकंप संभावित क्षेत्र के नक्शे को कई बार संशोधित किया जा चुका है। इसके बाद भी उसमें गलतियों की अभी भी बेहद गुंजाइश है। भारत के सीस्मिक ज़ोन मैप को पांच बार संशोधित किया जा चुका है। लेकिन अब भी उसे सटीक नक्शा नहीं कहा जा सकता। आखिर अभी भी उसमें गलती क्यों है ? इसे ग्लोबल हीट फ्लों मैप से बदलकर समस्या का स्थाई समाधान निकाला जा सकता है। सवाल यही उठता है कि आखिर कब तक इंतजार किया जाता रहेगा ?

इसी तरह उत्तरी केलिफॉर्निया में बिग गीज़र्स की जगह पर 180 मेगावॉट का जियोथर्मल हार्नेस प्लांट 10 लाख घरों में बिजली पहुंचा रहा है। और दूसरी तरफ हमारे देश में बैरन द्वीप के ज्वालामुखी की आग 28 मई 2005 से बेकार जा रही है।

इसके लिए जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया और नेशनल फिजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट हैदराबाद क़दम उठा सकता है। लेकिन पता नहीं उसे किसता इंतजार है ?

दुनिया के 25 देश 10 हज़ार मेगावॉट बिजली ज़ियोथर्मल एनर्जी को क़ैद करके बना रहे हैं। और हमारे देश के मूल्यवान संसाधन बेकार जा रहे हैं। अब जबकि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में बड़ी-बड़ी इमारतें दिन रात बन रही हैं...जो कि किसी भी बड़े भूकंप को झेलने की स्थिति में नहीं हैं। ऐसे में क्या सोहना में हीट एक्सचेंजर लगाकर दिल्ली और हरियाणा को भूकंप मुक्त नहीं बनाया जा सकता ? जो कि एक इलेक्ट्रिक सर्किट को बचाने वाले मामूली लागत वाले फ्यूज़ की भूमिका अदा करेगा।

सवाल यही उठता है कि एक भुना हुऑआ पापड़ तोड़ने में इतना इंतजार किस बात का क्या इसमें जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया की ये जिम्मेदारी नहीं बनती कि वो इस तरह के इंतजाम करके दिल्ली और हरियाणा को भूकंप से हमेशा के लिए बचाने की व्यवस्था करे। सवाल उठता है कि जींद और नारनौल में रात दिन हल्के भूकंप जनता को क्यों सता रहे हैं ?

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण को तो शायद राष्ट्रीय आपदा का ही इंतजार रहेगा, हालांकि उस वक्त भी वो क्या करता है इसकी पोल कई बार खुल चुकी है।  


(आप यदि इस रिसर्च मे कुछ जोड़ना चाहते हैं या फिर अपनी आपत्ति दर्ज कराना चाहते हैं-आपका स्वागत है। मेरा ईमेल shambhunath2@gmail.com और फोन 09811536619 है। )


फोटो साभार-www.csaaa.in
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