Thursday, September 7, 2017

‘विचार’ तो विचार हैं

‘विचार’ तो विचार हैं.... फिर वो चाहे ‘राइट’ हो या ‘लेफ्ट’...
वैचारिक ‘क़त्लेआम’ का विरोध होना ही चाहिए_________
लेकिन भारत ऐसा देश बन गया था (शुक्र है अब वो स्पेस खुल रहा है) जहां केवल ‘लाल’ विचार को सलाम करने पर ही आपको ‘बुद्धिजीवी’ माना जाता था... हालांकि ये विचार ही अपने आपमें ‘बुद्धि’ का ‘कोढ़’ था, जिसका चंद साल में ही ‘अच्छा’ इलाज हो गया है... होना भी चाहिए था, होता भी क्यों नहीं ? 
____भारत में ‘कथित मीडिया’ हमेशा से ही ‘लाल सलाम’ के क़ब्जे में रहा है, वो तो शुक्र है तकनीक का, नहीं तो ये हमें इस 21वीं शताब्दी में भी ‘मानसिक गुलाम’ बनाकर ही रखने की मंशा पाले हुए थे... यदि ‘सोशल मीडिया’ जैसे स्वतंत्र प्लेटफॉर्म ना होते तो हमें आज भी ‘मानसिक गुलाम’ बनकर जीने पर मजबूर होना पड़ता.... 
अब जिसने भी बैंगलुरू में ‘गौरी लंकेश’ की हत्या की है, उसकी पहले सही तरह से जांच हो जानी चाहिए, ‘लाल बंदरों’ से मेरा आग्रह है कि वो अपने ‘गोत्र’ की कर्नाटक सरकार पर दबाव बनाएं कि पहले वो हत्यारों को ढूंढे, सलाखों के पीछे पहुंचाएं, अपनी ‘मानसिक जांच’ के आधार पर पहले ही नतीजे पर ना पहुंचे... अब जैसे दादरी में ‘अख़लाक’ की हत्या में सभी ‘लाल बंदर’ बजाय अपनी ‘गोत्र’ की अखिलेश सरकार को घेरने के केंद्र की मोदी सरकार को घेरने लगे थे, संभवत: गौरी लंकेश में भी सिद्धारमैया की सरकार को बख्शते हुए फिर से केंद्र सरकार को कटघरे में ना खड़ा करने लगे जाएं...


लाल सलाम के पत्रकारों की दिक्कत ही यही है... जहां-जहां इनके ‘गोत्र’ की सरकारें होती हैं उनके ख़ून को तो ये माफ़ करते चलते हैं, लेकिन दूसरे ‘गोत्र’ की सरकारों में भी खासकर बीजेपी की सरकारों को लपेटने में लग जाते हैं... इन्हीं के ‘गोत्र’ की सरकार वाले राज्य में जब इनका ‘गोती’ भाई/बहन मरता है तो ये तुरंत चिल्ला उठते हैं- It's Time ! Lets fight back
गौरी लंकेश की हत्या करने वालों ने यदि उसकी हत्या वैचारिक वजहों से की है तो वो निरे मूर्ख थे, भाई जो पहले ही Irrelevant/अप्रासंगिक हो गया हो उसे मारकर पाप के भागीदार क्यों बन रहे हो... ऐसे लोगों को मारने की कोई आवश्यकता ही नहीं है, जो ‘मानसिक’ तौर पर पहले ही मर चुके हों...
जो वैचारिक तौर नहीं मारे जा सकते और ‘देश’ के लिए, ‘समाज’ के लिए ‘घातक’ हों, लगातार ‘ख़तरा’ बने हुए हों उनका वध करो... उस वध का हम समर्थन करेंगे, ऐसे निरर्थक वध का समर्थन करने का कोई लाभ नहीं है... इसलिए मैं व्यक्तिगत तौर पर बिना गौरी लंकेश से सहानुभूति रखे हुए हत्या की निंदा करता हूं...

Thursday, July 27, 2017

भारत में 'हलाल सर्टिफाइड' फूड की मनमानी

मानव विकास में शरुआती खान-पान मांस आहार ही था, खुद मारकर कच्चा मांस ही खाया जाता था, 
धीर-धीरे बाक़ी चीजें इसमें जुड़ती गईं... विकास के साथ प्रकृति की वो खाने की वस्तुएं भी जुड़ती गईं, जिसके लिए मनुष्य को ज्यादा परिश्रम करना पड़ता था, इसके बाद खान-पान की आदतों में बदलाव आने लगा, वर्गीकरण मांसाहारी और शकाहारी का होता चला गया...



वक्त बीतने के साथ-साथ मांस खाने के नियम बने और समाजों ने उनके मुताबिक जानवरों को मारने का तरीका अपने हिसाब से ईजाद कर लिया... इसमें किसी को कोई आपत्ति भी नहीं, हो भी क्यों ? 

सभी समाजों में ख्याल ये रखा जाने लगा कि जिस जानवर को जीभ के लिए क़ुर्बान किया जा रहा है, उसे कम से कम तकलीफ हो... इसके बाद जानवरों को मारने के कई मॉड्यूल विकसित होते चले गए... इस पर भी किसी को कोई आपत्ति नहीं।
सभी देशों ने अपने हिसाब से और प्राकृतिक संतुलन के विश्व मानको को नज़र में रखते हुए अपने-अपने मानक तैयार कर लिए... समय बीतने के साथ खाड़ी देशों में इस्लाम जन्म लेता है और वहां जानवरों को मारने के दुनिया में प्रचलित नियमों से अलग नियम बनाए जाते हैं... चुंकि इस पूरे इलाके में कबिलाई कल्चर ही हावी था, लोग अनपढ़ थे, ज्यादा समझ थी नहीं उन्हें, लिहाजा उनकी जो समझ में आ सकता है, उस हिसाब से जानवर मारने के नियमों को प्रतिपादित किया गया... जिसका नाम ‘हलाल’ रख दिया और क़ुरान में ऐसा है, शरिया में लिखा है-ऐसा प्रचारित किया गया और इस्लाम को मानने वाले उसे मानने लगे... हमें इसमें कोई आपत्ति नहीं, होनी भी क्यों चाहिए... सभी को अपने हिसाब से जीने और खाने-पीने का हक़ है...
लेकिन____________________________________________________________________
दूसरे धर्म को मानने वालों पर अपना ‘हलाल सर्टिफिकेट’ कोई कैसे थोप सकता है… जी हां भारत में चुपके से, बिना किसी को बताए खाने-पीने के उत्पादों पर ‘हलाल’ का ठप्पा लगाकर बेचा जाने लगा है,
Snack Food Association, Fssai के साथ Halal भी लिखा हुआ था। इसे देखने के बाद सवाल उठना और उठाना लाजिमी था...
फिर वो चाहे मांसाहार हो या फिर शाकाहारी वस्तु ही क्यों ना हो, कलमा पढ़कर आपको बिना बताए चीजें बेची जा रही हैं, खिलाई जा रही हैं... इसमें केवल मुसलमान ही शामिल नहीं हैं बल्कि वो सूदखोर, मुनाफाखोर हिंदू व्यापारी भी शामिल हैं जो खुद को धर्मभीरु बताते थकते नहीं हैं... ये भी मुझे अचानक पता चला जब मेरे बड़े भाई ने बताया, जो कि इस वक्त हमारे बीमार पिताजी के साथ दिल्ली से सटे कौशांबी के मैक्स हॉस्पिटल में कई दिन से मौजूद हैं। पर्याप्त समय होने की वजह से उनका ध्यान इस पर चला गया, जब उन्होंने एक चिप्स का पैकेट खरीदकर खाया...
डस्टबिन तक जाने में हुई देरी ने ये खुलासा करवा दिया... पैकेट को ध्यान से देख रहे थे कि अचानक उनकी निगाह Halal लिखे सिंबल पर पड़ गई....
आखिर एक Multi cultural देश में कोई ऐसा कैसे कर सकता है ? इसकी इजाज़त आखिर किसने दी ? किसी ने कैसे इसका विरोध नहीं किया, क्यों दूसरे धर्म को मानने वालों को जबरन Halal सर्टिफिकेट वाला कुछ भी बिना बताए खिलाया जा रहा है। क्या गारंटी है कि हलाल सर्टिफिकेट वाले किसी वैजिटेरियन आइटम में कोई मांस ना मिलाया गया हो ? ऐसा मैक-डोनल्ड पहले कर चुका है।
हलाल सर्टिफिकेशन का मतलब ही है कुरान से कलमा पढ़कर प्रोडक्ट बनाने के बाद फिर उसे बाज़ार में उतारा जाए, किसी हिंदू या किसी और को भी कैसे कलमा पढ़ा प्रोडक्ट खाने को दिया जा सकता है, इसमें आपत्ति इस बात की है कि ये काम चोरी-चोरी हो रहा है, जिसे बैक एंट्री से जबरन घुसाया जा रहा है।
 जबकि ये ग्राहक का अधिकार है कि उसे पता होना चाहिए कि वो क्या खा रहा है ? बेशक फिर वो आइटम शाकाहारी ही क्यों ना हो।
ये अंतराष्ट्रीय सिंबल है
मज़हबी राजनीतिक जमातों ने पहले बहुत कुछ बांट दिया है, अब खान-पान को भी बांटने पर आए हैं वो भी चोरी-छिपे... और सहारा लिया है हलाल सर्टिफेकिकेशन... इस हलाल सर्टिफिकेट के चलन की प्रवृत्ति को तुरंत कुचलने की ज़रूरत है... यदि ऐसा नहीं किया गया तो आप किस मुंह से संभावित ‘झटका सर्टिफिकेशन’ की उठने वाली मांग को खारिज़ कर पाएंगे...
किसी भी लोकतांत्रिक, धर्म निरपेक्ष देश में इस तरह के चलन को रोकना ही होगा... नहीं तो फिर ‘झटका सर्टिफिकेशन’ ‘जैन सर्टिफिकेशन’ ‘बौद्ध सर्टिफिकेशन’ ‘सिख सर्टिफिकेशन’ की उठने वाली मांग को कैसे नाज़ायज ठहरा जा सकेगा...
 दुनियाभर में हलाल सर्टिफिकेशन का जबर्दस्त विरोध हुआ है... हमारे यहां भारत में जब किसी को पता ही नहीं है तो विरोध होने का मतलब ही नहीं है... लेकिन इस तरह की बातें आखिर कितने दिन तक छिपाई जा हैं ? 
ऑस्ट्रेलिया में इसके ख़िलाफ़ 2014 से मूवमेंट चल रहा है, कनाडा ने इस सर्टिफिकेशन को अपने यहां घुसने ही नहीं दिया... ब्रिटेन में घुस गया है तो जबर्दस्त विरोध का सामना करना पड़ रहा है... हमारे पड़ोसी देश श्रीलंका में भारी विरोध के बाद सरकार को हलाल सर्टिफिकेशन को प्रतिबंधित करना पड़ा है।
अब भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में इसके विरोध की तैयारी है, संभव है जिसे तुरंत मान भी लिया जाए...


बिल्कुल खुलेआम बिक्री जारी है

इस सिंबल के साथ विरोध किया जा रहा है


ये सर्टिफिकेट है जो दिया जा रहा है

Thursday, July 6, 2017

सांप्रदायिकता पर समान प्रहार कब ?

ये चारो चित्र मेरी कोरी कल्पना मात्र हैं...

ऐसा भारतीय इतिहास में कभी नहीं हुआ, होता भी कैसे ?

कुछ स्वार्थ पिपासुओं ने ऐसी संस्कृति विकसित होने ही नहीं दी, मुझे लगता है जिसमें गांधी जी इन सभी के सिरमौर थे, ऐसा मुझे लगता है- जरूरी नहीं आपको भी लगे... जिसे आज़ादी के बाद कथित पंडित नेहरू 'जी' ने वामपंथियों के साथ मिलकर एक षड़यंत्र के साथ फुल रफ्तार से आगे बढ़ाया... और ये वो संस्कृति थी, जिसमें दूसरी-तीसरी-चौथी पीढ़ी विकसित होने लगी... उन्हें लगने लगा कि यही संस्कृति ही सेकुलरिज़्म की संस्कृति है... ऐसे ही भारत चलेगा...

इसी उहापोह में भारत के सबसे अहम 6,7 दशक बीत गए... यानी इस दौर में ये एकतरफा संस्कृति रूढ़ होती चली गई... गोधरा कांड के बाद अतार्किक चीजों को इतना आगे बढ़ाया गया कि उसकी स्वभाविक प्रतिक्रिया 2014 में दिखी... पोस्ट गोधरा के बाद इतनी सारी चीजें एक साथ घटित हो रहीं थी कि भारतीय जनता ने 'मोदी' नाम के विचार के साथ स्वभाविक और अस्वभाविक अपना मानसिक गठबंधन बना लिया... वो भी इसलिए हो पाया, क्योंकि इस बीच मीडिया का सबसे सशक्त माध्यम सोशल मीडिया धीरे-धीरे अंडर करंट विकसित हो रहा था, जिसे इन जैसे लोगों ने उस गंभीरता से नहीं लिया, जिस गंभीरता से हम जैसे यानी विरोधी विचारधारा के लोगों ने लिया...क्योंकि इनके पास अपनी बात रखने का दूसरा कोई माध्यम नहीं था... या ये भी कह सकते हैं इनकी कोई सुनने वाला नहीं था... इसलिए अब जब हम जैसे लोग अपनी बात कहते हैं तो 6,7 दशक से एकतरफा सोच में पले-बढ़े लोगों का तिलमिलाना जायज हो जाता है... 

ऐसी तस्वीरे हम देखना चाहते हैं और ये हमारी जायज मांग भी है... लेकिन ऐसा हो नहीं पाया... 
देश में कितने सारे ऐसे मौके आए जब ये चुप रहे, हम जैसों के पास कोई प्लेटफॉर्म नहीं थो बोलने के लिए लेकिन इनके पास तो था, फिर भी खामोश रहे, जब आप अपने निजी स्वार्थ पर सच्चाई को छिपाने का काम करते हैं तो ऐसे 'अच्छे दिन' आते ही हैं, वो इन जैसों के लिए बुरे साबित हो जाएं तो उसमें हम क्या करें...
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