Thursday, December 30, 2010

और पानी हो गया सरप्लस ....

जहां खेतों में अब खुशहाली है
और पानी हो गया सरप्लस ....

(वादे के मुताबिक मैं आपके सामने एक ऐसी हक़ीक़त लेकर पहुंचा हूं...जिससे अगर प्रेरणा ले ली जाए तो देश की पानी की समस्या को कम बेशक न किया जा सके लेकिन नियंत्रण में जरुर किया जा सकता है।)




क्या किसी की सजा किसी के लिए वरदान हो सकती है ?...बिल्कुल ऐसा हुआ है...कहां मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में...मामला शुरु होता है एक आईपीएस अधिकारी राजेश गुप्ता की पनिशमेंट पोस्टिंग से...जिन्हें ग्राम पंचायत का सीईओ बना दिया गया...अब राजेश गुप्ता जो कि आईआईटी से ग्रेजुएट हैं...पुलिस में नौकरी करने की काबलियत और किसी भी परिस्थिति में अच्छा काम कर जाने के जज़्बे ने खंडवा जिले की तक़दीर बदल कर रख दी...अपनी इस पोस्टिंग में राजेश गुप्ता ने ऐसा कारनामा कर दिखाया जिसकी मिसाल मिलना आज के दौर में बिल्कुल भी आसान नहीं रह गया है। 


सन 1999 के आसपास खंडवा जिले में खतरनाक सूखा पड़ा...नदी...तालाब...कुएं सभी सूख गए...पानी पीने के लिए नहीं बचा...तो फिर खेती के लिए पानी की बात करना ही बेमानी था...लोग खंडवा छोड़कर पानी वाली जगह पलायन करने लगे...इस तरह के निराशजनक माहौल में राजेश गुप्ता ने डूबते जिले की कमान संभाली...स्थानीय लोगों को साथ लेकर, अपनी इंजीनियरिंग बुद्धि का इस्तेमाल करते हुए खंडवा जैसे पठारी इलाके में बरसात के पानी की एक-एक बूंद को रोकने का प्लान बनाया। 

जैसा कि इस तरह के काम की शुरुआत में कहीं भी होता है वही यहां भी हुआ ...चारों तरफ से केवल और केवल हतोउत्साहित करने की ही बाते होने लगी...ये बिल्कुल वैसा ही काम था जैसा भगीरथ की कथा में गंगा को ज़मीन पर उतारने की कथा में मिलता है। एक सच्चाई ये भी है कि भगीरथ को तो किसने देखा लेकिन राजेश गुप्ता को तो सबने देखा...फिर भी उत्साह देने के लिए कोई आगे नहीं आ रहा था...लेकिन प्रवाह के विरुद्ध काम करने की लगन ने खंडवा के इस भगीरथ को तनिक भी विचलित नहीं किया... 

खंडवा के पठारों में छोटे-छोटे गड्डे खोदने का काम किया जाने लगा...जिसे स्थानीय बोली में कुंडियां कहा गया। और राजेश गुप्ता ने जिसे पानी की जेल कहा। जिसमें पानी को क़ैद करने की योजना बनाई गई...इसी तरह बरसात के बहते हुए पानी के रास्तों में केएचएस (KHS)यानी खंडवा हाईड्रोलिक स्ट्रक्चर का निर्माण कराया जाने लगा...इस बीच साथ काम करने वाले लोगों का धैर्य जवाब भी देने लगा...क्योंकि कुंडियां...केएचएस बनाने में तक़रीबन 3-4 साल का गाढ़ा वक्त जो लग गया। लोग अपने ही द्वारा किए गए काम पर शंका करने लगे...लेकिन राजेश गुप्ता मानों पूरी तरह से आश्वस्त थे...अपने पर पूरा भरोसा...अपने काम पर पूरा यक़ीन....

इन तीन-चार सालों में कुंडिया और केएचएस बनाने के चक्कर में गांव का एक एक आदमी और किसान पानी बचाने के एक एक उपाय को इतनी अच्छी तरह समझ चुका था कि उसे अब राजेश गुप्ता की जरुरत नहीं थी...यानी राजेश गुप्ता ने गांववालों को आत्मनिर्भर जो बना दिया था। एक-एक आदमी को वॉटर हार्वेस्टिंग का एक्पर्ट बना दिया था। हमें कई गांव वाले ऐसे भी मिले जिन्हें अक्षर ज्ञान नहीं था लेकिन बात वो ऐसे करता था कि मानो वो कोई एक्पर्ट हो।  

धीरे-धीरे वो दिन भी आया जब काम पूरा होने को था...काम अभी पूरा भी नहीं हुआ था कि प्री मॉनसून एक बरसात हुई...जिसमें 4 साल में मेहनत करके बनाए गए सभी स्ट्रक्चर्स ने पानी अपने अंदर सोख लिया...पानी अब ज़मीन के अंदर क़ैद हो चुका था, पानी के सभी स्रोतों को भर दिया...और फिर मुश्किल से दो बारिश और हुई और खंडवा में पानी सरप्लस हो गया। अब खंडवा के पास इतना पानी था कि वो अपने पड़ोस के जिलों को भी पानी देने की स्थिति में आ गया।  


आज खंडवा में किसान वो फसल भी अपने खतों में लगा रहे हैं जिन्हें पानी की कमी के चलते कभी इतिहात में नहीं लगाया गया था। अरबी जैसी फसल अब खंडवा में आम बात हो गई है। यहां पानी को रोकने की कीमत महज 5 पैसे प्रति 1000 लीटर आ रही है। इसलिए खंडवा के इस मॉडल को खंडवा जैसे रॉक स्ट्रक्चर वाले इलाकों में बेधड़क अपनाया जा सकता है। बड़े-बड़े बांधों की बजाए इस तरह के उपायों को क्यों नहीं अपनाया जाना चाहिए...? इसके चाहिए तो केवल राजनीतिक इच्छा शक्ति...और कुछ नहीं...उदाहरण पेश कर दिया एक आईपीएस ने अब बारी किसकी है...


जल क्रांति के बाद शासन ने राजेश गुप्ता को  फिर से प्रमोशन देकर वापस पुलिस सेवा में बुला लिया...कुछ दिन राजेश गुप्ता की पोस्टिंग मुरैना में रही...आजकल उनकी पोस्टिंग कहां है मुझे इसकी जानकारी नहीं है। वो जहां भी हों उनकी लंबी उम्र की कामना हमेशा रहेगी...


मुझे श्री राजेश गुप्ता ने व्यक्तिगत तौर बेहद प्रभावित किया है।


"कोई भी काम शुरुआत में छोटा ही होता है"
                                                               -राजेश गुप्ता,आईपीएस








फोटो सभार:एपी


Monday, December 27, 2010

और पानी हो गया सरपल्स ? अब्दुल रहीम खानखाना कि बेमिसाल इंजीनियरिंग

क्या कभी किसी ने ऐसी वाटर हार्वेस्टिंग देखी और सुनी है जिसमें इतना पानी बचाया गया हो कि पानी सरप्लस हो गया ...?
जी हाँ भारत में एक इलाका ऐसा भी है जहाँ के लोगों नें इतना पानी बचाया कि पानी सरप्लस हो गया. ये सब किसनें किया एक आई पी एस ने...

जल्दी इसका खुलासा किया जायगा...साथ ही आपको अब्दुल रहीम खानखाना कि बेमिसाल इंजीनियरिंग के भी दर्शन कराए जाएंगे...जो कि सैकड़ों साल बाद भी लोगों की प्यास बुझा रहा है...

मेरे इस ब्ल़ॉग पर आपको भारत के बारे में वो सारी जानकारी मिलेगी...जिसके दम पर हम सभी पूर्व राष्ट्रपति एपीजे कलाम के दिए लक्ष्य की तरफ आगे बढ़ने का प्रयास कर सकेंगे...मिशन 2020

कोई बकवास नहीं....कोई ज्ञान नहीं...आगे बढ़ने की सीधी सीधी बात...

भारत का आज का विज्ञान

Sunday, December 19, 2010

विज्ञान बोरियत का दूसरा नाम बिल्कुल नहीं है।

जब हम भारत के चंद्रयान की बात करते हैं तो इसमें हमें निश्चित तौर पर गर्व होना चाहिए और होता भी है, अब तक हमने उन बातों पर गर्व किया जिसे हमने देखा नहीं है, लेकिन अब वक्त आ गया है क हम अपने विज्ञान पर भी गर्व करना सीखें। आज हम अपने उन लोगों पर विश्वास और गर्व कर सकते हैं जिन्होंने हमें निराशा के गर्त से बाहर लाने का काम किया है।

भारत में विज्ञान को अक्सर जानबूझकर बोर बनाया जाता है, बच्चे लाखों की तादात में विज्ञान विषय में अरुचि की वजह से उसे छोड़ देना बेहतर समझते हैं। मैं भी उन लाखों बच्चों में से एक था। लेकिन जब मैंने मीडिया में घुसकर इस विषय को जानने की कोशिश की तो जाना कि विज्ञान उतना
गूढ़ नहीं है जितना उसे गूढ़ बनाने का प्रयास किया जाता है।

एक उदाहरण आपको देना चाहता हूं। गांधीवाद जैसा विषय जिसे अच्छे से अच्छा गांधीवादी भी सरल ढंग से कभी पेश नहीं कर पाया। उन लोगों ने इसे ज्यादा मुश्किल बनाकर रखा, जो लोग गांधीवाद पर दुकान चला रहे थे। ऐसा नहीं है कि उसे आसान बनाया नहीं जा सकता था, लेकिन उसके लिए अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ती है। मानवीय स्वभाव ऐसा है कि वो मुश्किल चीजों से अक्सर बचना ही चाहता है। आराम से जो हो जाए वही वो करना चाहता है। बस नतीजा ये हुआ कि गांधीवाद,  गांधी जी के मरने के बाद...कई दशकों तक यूं ही गूढ़ बना रहा। जबकि पूरी दुनिया उसके महत्व को समझ रही थी, लेकिन जिस देश की वो थाती था... वही देश उससे महरुम दिखता रहा। इसे विडंबना ही कहना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र 2 अकटूबर को विश्व शांति दिवस मनाता रहा,  लेकिन भारत गांधी के विचार से लगातार प्यासा ही रहा। वजह साफ थी गांधी विचार को लगातार दुरुह बनाकर रखा गया। हो सकता हो ऐसा अनजाने में ही हुआ हो, फिर भी ऐसा हुआ तो है।
जबकि पूरी दुनिया गांधी की प्रासंगिकता पर गदगद हुए जा रही थी,  एक हम थे कि मुर्खों की तरह जापान,जर्मनी समेत बाक़ी दुनिया को गांधीवाद के लिए निहार रहे थे। क्योंकि जापान और जर्मनी ने गांधीवाद को ढंग से समझा।

हमारे गांधी हमी से अनजान रहे। लेकिन फिल्म लगे रहो मुन्नाभाई ने जिस आसान तरीके से गांधीवाद को समझाया और उसे प्रेक्टिकल बनाकर दिखाया,  शायद कोई भी ऐसा नहीं कर पाया।
आखिर ऐसा क्यों हो पाया ? बस केवल और केवल गांधीवाद को आसान करने की वजह से। हालांकि फिल्मकार को इसके लिए काफी मशक्कत करनी पड़ी होगी। क्योंकि चीजों को सिम्लिफाई करना शायद सबसे बड़ा चुनौतीपुर्ण काम होता है।   इसी चुनौती को शायद हमारे विज्ञान के टीचर्स नहीं लेते हैं। दूसरी तरफ पश्चिमी देशों में विज्ञान को बेहद आसान और सुरुचिपूर्ण तरीकों से पढ़ाया जाता है। यदि पोगो चैनल के कुछ ऐसे प्रोग्राम्स को देखा जाए तो इसे और भी बेहतर तरीके से समझा जा सकता है।

अब मैं आता हूं मुद्दे पर....आखिर न्यूज़ मीडिया में विज्ञान का क्या भविष्य है ?
हालांकि मैंने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में विधिवत शुरुआत सन् 1998 में की थी लेकिन शुरुआत में,  मैं भी राजनीति से ज्यादा प्रेरित था, जैसा कि कोई भी युवा हो सकता है। श्री विनोद दुआ के साथ परख, प्रतिदिन, सहारा न्यूज़लाइन करने लगा। साढ़े तीन साल ये सब किया। तीन साल की इस अवधि में ही मुझे इसमें छिपी वो सारी बातें पता चल गई, नेताओं के पीछे माइक लेकर भागना, बाइट में ही पूरी पत्रकारिता का सिमट जाना, मानों ऐसा लगने लगा कि क्या ऐसे ही चलते चले जाने का नाम पत्रकारिता है ?

प्यास बुझाने के चक्कर में छोड़ दिया मुख्यधारा का मीडिया और पहुंच गया एक ऐसी जगह जहां हालांकि मैं कहने को वनवास में था। लेकिन उस वनवास ने सीखने की एक ऐसी दृष्टि उपलब्ध कराई जिसके बाद चुनौतियों से लड़कर बहुत कुछ सीखने को मिला। श्री संजय त्रिपाठी के साथ उन सारी चीजों को सीखा जिनसे विषयों को आसान बनाया जाता है। संजय जी के साथ ये सीखा कि जब तक आप विज्ञान को आसान नहीं बनाएंगे, तब तक न तो उसे कोई समझेगा और न ही कोई उसमें रुचि लेगा। इससे पहले एक गुरु मंत्र श्री विनोद दुआ से मिल ही चुका था कि जिस हिन्दी में आप अपनी मां से संवाद करते हो, केवल उसी तरह की भाषा का इस्तेमाल टेलिविज़न में इस्तेमाल करो।
मौका आया 2005 का, ये साल था अलबर्ट आइंस्टाइन की 'थ्योरी ऑफ़ रिलेटिविटी' के सौ साल पूरे होने का। इस साल को युनाइटेड नेशन्स ने नाम दिया 'इअर ऑफ़ मॉडर्न फिजिक्स'
इसी विषय पर पूरे साल भर  कार्यक्रमों की भरमार रही। 'पॉपुलराइज़ेशन ऑफ़ साइंस' के तहत इस पर तरह-तरह के प्रोग्राम्स बनाए गए। टेलिविज़न पर भी इसको लेकर प्रोग्राम्स बनाए गए। डिस्कवरी और नेशनल ज्योग्राफिक ने इसमें बाजी मारी। 2005 में किसी भी भारतीय चैनलों के मुक़ाबले इन्होंने टीआरपी के मामले में भी बाजी मारी। हालांकि हिन्दुस्तानी लोगों ने इन चैनलों के हिन्दी संस्करणों

को ही देखने में ज्यादा रुचि दिखाई है। दिखाए भी क्यों ना ?    

विज्ञान प्रसार, डिपार्टमेंट ऑफ़ साइंस एंड टेक्नॉलोजी, भारत सरकार ने भी इस टॉपिक पर प्रोग्राम बनाने का मन बनाया। विषय था 'थ्योरी ऑफ़ रिलेटिविटी' जिसे बनाया जाना था हिन्दी में। ये भी अपने आपमें एक चुनौतिपूर्ण था। बहरहाल इसी में छुपा हुआ था मेरा विज्ञान से नाता ना होने का ऐसा बड़ा तर्क, जिसे चुनौती देना 'थ्योरी ऑफ़ रिलेटिविटी' पर फिल्म बनाने से बड़ी चुनौती था...
मैंने चुनौती दी और 22 मिनट की ऐसी डॉक्युमेंटरी बनाई फिल्म बनाई...जिसने आलोचकों की वाहवाही तो लूटी ही साथ ही यूजीसी का नेशनल अवॉर्ड भी जीता...

ये सिलसिला बदस्तूर जारी भी रहा...फिर एक पॉपुलर न्यूज़ चैनल में प्रवेश किया...'चंद्रयान' पर 10 सीरीज़ का एक ऐसा प्रोग्राम बनाया जिसने प्रमुख न्यूज़ चैनलों में वाहवाही भी लूटी....इसरो और उस समय के इसरो प्रमुख माधवन नायर ने चंद्रयान पर बनी इस सीरीज़ की प्रशंसा की...
लेकिन विज्ञान की लोकप्रिय कथाओं को न्यूज़ संस्करण का पहिया धामी गति में आ गया है...
प्रयास है इसकी रफ्तार बढ़ाई जाए....संभवत: 2011 इस दिशा में नया साल हो सकता है।

"सभी साथियों से सहयोग की अपेक्षा है'' 

आपका

शंभुनाथ