Thursday, September 7, 2017

‘विचार’ तो विचार हैं

‘विचार’ तो विचार हैं.... फिर वो चाहे ‘राइट’ हो या ‘लेफ्ट’...
वैचारिक ‘क़त्लेआम’ का विरोध होना ही चाहिए_________
लेकिन भारत ऐसा देश बन गया था (शुक्र है अब वो स्पेस खुल रहा है) जहां केवल ‘लाल’ विचार को सलाम करने पर ही आपको ‘बुद्धिजीवी’ माना जाता था... हालांकि ये विचार ही अपने आपमें ‘बुद्धि’ का ‘कोढ़’ था, जिसका चंद साल में ही ‘अच्छा’ इलाज हो गया है... होना भी चाहिए था, होता भी क्यों नहीं ? 
____भारत में ‘कथित मीडिया’ हमेशा से ही ‘लाल सलाम’ के क़ब्जे में रहा है, वो तो शुक्र है तकनीक का, नहीं तो ये हमें इस 21वीं शताब्दी में भी ‘मानसिक गुलाम’ बनाकर ही रखने की मंशा पाले हुए थे... यदि ‘सोशल मीडिया’ जैसे स्वतंत्र प्लेटफॉर्म ना होते तो हमें आज भी ‘मानसिक गुलाम’ बनकर जीने पर मजबूर होना पड़ता.... 
अब जिसने भी बैंगलुरू में ‘गौरी लंकेश’ की हत्या की है, उसकी पहले सही तरह से जांच हो जानी चाहिए, ‘लाल बंदरों’ से मेरा आग्रह है कि वो अपने ‘गोत्र’ की कर्नाटक सरकार पर दबाव बनाएं कि पहले वो हत्यारों को ढूंढे, सलाखों के पीछे पहुंचाएं, अपनी ‘मानसिक जांच’ के आधार पर पहले ही नतीजे पर ना पहुंचे... अब जैसे दादरी में ‘अख़लाक’ की हत्या में सभी ‘लाल बंदर’ बजाय अपनी ‘गोत्र’ की अखिलेश सरकार को घेरने के केंद्र की मोदी सरकार को घेरने लगे थे, संभवत: गौरी लंकेश में भी सिद्धारमैया की सरकार को बख्शते हुए फिर से केंद्र सरकार को कटघरे में ना खड़ा करने लगे जाएं...


लाल सलाम के पत्रकारों की दिक्कत ही यही है... जहां-जहां इनके ‘गोत्र’ की सरकारें होती हैं उनके ख़ून को तो ये माफ़ करते चलते हैं, लेकिन दूसरे ‘गोत्र’ की सरकारों में भी खासकर बीजेपी की सरकारों को लपेटने में लग जाते हैं... इन्हीं के ‘गोत्र’ की सरकार वाले राज्य में जब इनका ‘गोती’ भाई/बहन मरता है तो ये तुरंत चिल्ला उठते हैं- It's Time ! Lets fight back
गौरी लंकेश की हत्या करने वालों ने यदि उसकी हत्या वैचारिक वजहों से की है तो वो निरे मूर्ख थे, भाई जो पहले ही Irrelevant/अप्रासंगिक हो गया हो उसे मारकर पाप के भागीदार क्यों बन रहे हो... ऐसे लोगों को मारने की कोई आवश्यकता ही नहीं है, जो ‘मानसिक’ तौर पर पहले ही मर चुके हों...
जो वैचारिक तौर नहीं मारे जा सकते और ‘देश’ के लिए, ‘समाज’ के लिए ‘घातक’ हों, लगातार ‘ख़तरा’ बने हुए हों उनका वध करो... उस वध का हम समर्थन करेंगे, ऐसे निरर्थक वध का समर्थन करने का कोई लाभ नहीं है... इसलिए मैं व्यक्तिगत तौर पर बिना गौरी लंकेश से सहानुभूति रखे हुए हत्या की निंदा करता हूं...

Thursday, July 27, 2017

भारत में 'हलाल सर्टिफाइड' फूड की मनमानी

मानव विकास में शरुआती खान-पान मांस आहार ही था, खुद मारकर कच्चा मांस ही खाया जाता था, 
धीर-धीरे बाक़ी चीजें इसमें जुड़ती गईं... विकास के साथ प्रकृति की वो खाने की वस्तुएं भी जुड़ती गईं, जिसके लिए मनुष्य को ज्यादा परिश्रम करना पड़ता था, इसके बाद खान-पान की आदतों में बदलाव आने लगा, वर्गीकरण मांसाहारी और शकाहारी का होता चला गया...



वक्त बीतने के साथ-साथ मांस खाने के नियम बने और समाजों ने उनके मुताबिक जानवरों को मारने का तरीका अपने हिसाब से ईजाद कर लिया... इसमें किसी को कोई आपत्ति भी नहीं, हो भी क्यों ? 

सभी समाजों में ख्याल ये रखा जाने लगा कि जिस जानवर को जीभ के लिए क़ुर्बान किया जा रहा है, उसे कम से कम तकलीफ हो... इसके बाद जानवरों को मारने के कई मॉड्यूल विकसित होते चले गए... इस पर भी किसी को कोई आपत्ति नहीं।
सभी देशों ने अपने हिसाब से और प्राकृतिक संतुलन के विश्व मानको को नज़र में रखते हुए अपने-अपने मानक तैयार कर लिए... समय बीतने के साथ खाड़ी देशों में इस्लाम जन्म लेता है और वहां जानवरों को मारने के दुनिया में प्रचलित नियमों से अलग नियम बनाए जाते हैं... चुंकि इस पूरे इलाके में कबिलाई कल्चर ही हावी था, लोग अनपढ़ थे, ज्यादा समझ थी नहीं उन्हें, लिहाजा उनकी जो समझ में आ सकता है, उस हिसाब से जानवर मारने के नियमों को प्रतिपादित किया गया... जिसका नाम ‘हलाल’ रख दिया और क़ुरान में ऐसा है, शरिया में लिखा है-ऐसा प्रचारित किया गया और इस्लाम को मानने वाले उसे मानने लगे... हमें इसमें कोई आपत्ति नहीं, होनी भी क्यों चाहिए... सभी को अपने हिसाब से जीने और खाने-पीने का हक़ है...
लेकिन____________________________________________________________________
दूसरे धर्म को मानने वालों पर अपना ‘हलाल सर्टिफिकेट’ कोई कैसे थोप सकता है… जी हां भारत में चुपके से, बिना किसी को बताए खाने-पीने के उत्पादों पर ‘हलाल’ का ठप्पा लगाकर बेचा जाने लगा है,
Snack Food Association, Fssai के साथ Halal भी लिखा हुआ था। इसे देखने के बाद सवाल उठना और उठाना लाजिमी था...
फिर वो चाहे मांसाहार हो या फिर शाकाहारी वस्तु ही क्यों ना हो, कलमा पढ़कर आपको बिना बताए चीजें बेची जा रही हैं, खिलाई जा रही हैं... इसमें केवल मुसलमान ही शामिल नहीं हैं बल्कि वो सूदखोर, मुनाफाखोर हिंदू व्यापारी भी शामिल हैं जो खुद को धर्मभीरु बताते थकते नहीं हैं... ये भी मुझे अचानक पता चला जब मेरे बड़े भाई ने बताया, जो कि इस वक्त हमारे बीमार पिताजी के साथ दिल्ली से सटे कौशांबी के मैक्स हॉस्पिटल में कई दिन से मौजूद हैं। पर्याप्त समय होने की वजह से उनका ध्यान इस पर चला गया, जब उन्होंने एक चिप्स का पैकेट खरीदकर खाया...
डस्टबिन तक जाने में हुई देरी ने ये खुलासा करवा दिया... पैकेट को ध्यान से देख रहे थे कि अचानक उनकी निगाह Halal लिखे सिंबल पर पड़ गई....
आखिर एक Multi cultural देश में कोई ऐसा कैसे कर सकता है ? इसकी इजाज़त आखिर किसने दी ? किसी ने कैसे इसका विरोध नहीं किया, क्यों दूसरे धर्म को मानने वालों को जबरन Halal सर्टिफिकेट वाला कुछ भी बिना बताए खिलाया जा रहा है। क्या गारंटी है कि हलाल सर्टिफिकेट वाले किसी वैजिटेरियन आइटम में कोई मांस ना मिलाया गया हो ? ऐसा मैक-डोनल्ड पहले कर चुका है।
हलाल सर्टिफिकेशन का मतलब ही है कुरान से कलमा पढ़कर प्रोडक्ट बनाने के बाद फिर उसे बाज़ार में उतारा जाए, किसी हिंदू या किसी और को भी कैसे कलमा पढ़ा प्रोडक्ट खाने को दिया जा सकता है, इसमें आपत्ति इस बात की है कि ये काम चोरी-चोरी हो रहा है, जिसे बैक एंट्री से जबरन घुसाया जा रहा है।
 जबकि ये ग्राहक का अधिकार है कि उसे पता होना चाहिए कि वो क्या खा रहा है ? बेशक फिर वो आइटम शाकाहारी ही क्यों ना हो।
ये अंतराष्ट्रीय सिंबल है
मज़हबी राजनीतिक जमातों ने पहले बहुत कुछ बांट दिया है, अब खान-पान को भी बांटने पर आए हैं वो भी चोरी-छिपे... और सहारा लिया है हलाल सर्टिफेकिकेशन... इस हलाल सर्टिफिकेट के चलन की प्रवृत्ति को तुरंत कुचलने की ज़रूरत है... यदि ऐसा नहीं किया गया तो आप किस मुंह से संभावित ‘झटका सर्टिफिकेशन’ की उठने वाली मांग को खारिज़ कर पाएंगे...
किसी भी लोकतांत्रिक, धर्म निरपेक्ष देश में इस तरह के चलन को रोकना ही होगा... नहीं तो फिर ‘झटका सर्टिफिकेशन’ ‘जैन सर्टिफिकेशन’ ‘बौद्ध सर्टिफिकेशन’ ‘सिख सर्टिफिकेशन’ की उठने वाली मांग को कैसे नाज़ायज ठहरा जा सकेगा...
 दुनियाभर में हलाल सर्टिफिकेशन का जबर्दस्त विरोध हुआ है... हमारे यहां भारत में जब किसी को पता ही नहीं है तो विरोध होने का मतलब ही नहीं है... लेकिन इस तरह की बातें आखिर कितने दिन तक छिपाई जा हैं ? 
ऑस्ट्रेलिया में इसके ख़िलाफ़ 2014 से मूवमेंट चल रहा है, कनाडा ने इस सर्टिफिकेशन को अपने यहां घुसने ही नहीं दिया... ब्रिटेन में घुस गया है तो जबर्दस्त विरोध का सामना करना पड़ रहा है... हमारे पड़ोसी देश श्रीलंका में भारी विरोध के बाद सरकार को हलाल सर्टिफिकेशन को प्रतिबंधित करना पड़ा है।
अब भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में इसके विरोध की तैयारी है, संभव है जिसे तुरंत मान भी लिया जाए...


बिल्कुल खुलेआम बिक्री जारी है

इस सिंबल के साथ विरोध किया जा रहा है


ये सर्टिफिकेट है जो दिया जा रहा है

Thursday, July 6, 2017

सांप्रदायिकता पर समान प्रहार कब ?

ये चारो चित्र मेरी कोरी कल्पना मात्र हैं...

ऐसा भारतीय इतिहास में कभी नहीं हुआ, होता भी कैसे ?

कुछ स्वार्थ पिपासुओं ने ऐसी संस्कृति विकसित होने ही नहीं दी, मुझे लगता है जिसमें गांधी जी इन सभी के सिरमौर थे, ऐसा मुझे लगता है- जरूरी नहीं आपको भी लगे... जिसे आज़ादी के बाद कथित पंडित नेहरू 'जी' ने वामपंथियों के साथ मिलकर एक षड़यंत्र के साथ फुल रफ्तार से आगे बढ़ाया... और ये वो संस्कृति थी, जिसमें दूसरी-तीसरी-चौथी पीढ़ी विकसित होने लगी... उन्हें लगने लगा कि यही संस्कृति ही सेकुलरिज़्म की संस्कृति है... ऐसे ही भारत चलेगा...

इसी उहापोह में भारत के सबसे अहम 6,7 दशक बीत गए... यानी इस दौर में ये एकतरफा संस्कृति रूढ़ होती चली गई... गोधरा कांड के बाद अतार्किक चीजों को इतना आगे बढ़ाया गया कि उसकी स्वभाविक प्रतिक्रिया 2014 में दिखी... पोस्ट गोधरा के बाद इतनी सारी चीजें एक साथ घटित हो रहीं थी कि भारतीय जनता ने 'मोदी' नाम के विचार के साथ स्वभाविक और अस्वभाविक अपना मानसिक गठबंधन बना लिया... वो भी इसलिए हो पाया, क्योंकि इस बीच मीडिया का सबसे सशक्त माध्यम सोशल मीडिया धीरे-धीरे अंडर करंट विकसित हो रहा था, जिसे इन जैसे लोगों ने उस गंभीरता से नहीं लिया, जिस गंभीरता से हम जैसे यानी विरोधी विचारधारा के लोगों ने लिया...क्योंकि इनके पास अपनी बात रखने का दूसरा कोई माध्यम नहीं था... या ये भी कह सकते हैं इनकी कोई सुनने वाला नहीं था... इसलिए अब जब हम जैसे लोग अपनी बात कहते हैं तो 6,7 दशक से एकतरफा सोच में पले-बढ़े लोगों का तिलमिलाना जायज हो जाता है... 

ऐसी तस्वीरे हम देखना चाहते हैं और ये हमारी जायज मांग भी है... लेकिन ऐसा हो नहीं पाया... 
देश में कितने सारे ऐसे मौके आए जब ये चुप रहे, हम जैसों के पास कोई प्लेटफॉर्म नहीं थो बोलने के लिए लेकिन इनके पास तो था, फिर भी खामोश रहे, जब आप अपने निजी स्वार्थ पर सच्चाई को छिपाने का काम करते हैं तो ऐसे 'अच्छे दिन' आते ही हैं, वो इन जैसों के लिए बुरे साबित हो जाएं तो उसमें हम क्या करें...
 ,,,,#हिंदी_ब्लॉगिंग #हिन्दी_ब्लॉगिंग

Thursday, November 10, 2016

ग्रेजुएशन के दोस्त, 25 साल का याराना, पार्ट-1

साल 1989 का वो दिन जब B.A. (Hons.) Geography की लिस्ट आनी थी... 12वीं पास करके एक ऐसी दुनियां में कदम रखने जा रहे थे, जहां से दुनिया का नया फलक खुलने वाला था...
तस्वीर में कनीज़ की दबंगई दिखती है

12 में हमने माज़िद हुसैन की लिखी हुई हिंदी में भूगोल की किताब पढ़ी और वही टीचर जामिया में हमारे सामने थे... सोचो हमारी खुशी का ठिकाना क्या रहा होगा...?

उस वक्त जामिया में ग्रेजुएशन में एडमिशन के लिए इंटरव्यू से गुजरना होता था... (हो सकता है आज भी गुजरना होता हो) शायद इसलिए ही हमारा एडमिशन जामिया में हो भी गया... क्योंकि हमारे अंदर टेलेंट तो कूट-कूटकर भरा हुआ था...

गिरि समेत हमारे सभी दोस्तों का पहली ही लिस्ट में नंबर आ गया... टेलेंट होने के बावजूद मेरा नंबर वेटिंग लिस्ट में ही था... क्योकि डेस्टिनी को कुछ और ही मंजूर था... मेरा भी एडमिशन ज्योग्राफी में ही हो गया...

साल 1989... क्लास में तरह-तरह के सर्वे... प्रेक्टिकल.... मैप... और ना जाने क्या-क्या...

25 साल पहले ऐसा नहीं था गिरि
इसी बीच class representative यानी सीआर का इलेक्शन हुआ... हमारे घनश्याम मिश्रा जी सीआर चुने गए... हम सभी के लिए ये तजुर्बा भी गज़ब का रहा... फ्रेशर पार्टी में हमें एक-दूसरे को जानने का मौक़ा मिला... गिरि की प्रबंधन कला का मैं तभी से कायल हो गया...

गिरि गज़ब का मैनेजर साबित हुआ... धीरे-धीरे गिरि हमारे बीच धुरी यानी Axis बनता गया... जैसे सूरज इस यूनिवर्स का Axis है वैसे ही हमारी क्लास का गिरि बनने लगा... गिरि बिना किसी भेदभाव के लड़के-लड़कियों की प्रेक्टिकल में मदद करने लगा... ये वही मौक़ा था जब हमारी बॉन्डिंग बननी शुरू हो गई...



राजेश, कनीज़, आजरा, शाहजहां, उरूस
हालांकि गिरि उस वक्त अंग्रेजी में कमजोर जरूर था लेकिन जब उसकी समझ में सवाल आ जाता था... तो उसका जवाब भी सबसे पहले वही देता था.. सवाल को बखूबी समझाने का काम मिश्रा जी किया करते थे...

वक्त बीता... मैं गिरि, विक्रम, केके NSS के संपर्क में आए... ये हमारे सेकंड ईयर का साल 1990 था... जामिया में एक कैंप हुआ, जिसमें शादाब उमर, गिरि, के के और मैं शामिल हुए... हमें मजा आने लगा...  फिर कैंप अटैंड करने का सिलसिला चल निकला...मोनिस ने भी हमारे साथ कैंप किए...
NSS कैंप की तस्वीर

कैंप में वक्त ना बर्बाद करने की सलाह हमारे दोस्त संजय त्यागी और हमारी प्यारी बहन उरूस फ़ातिमा ने दी... त्यागी ने तो यहां तक कहा--अबे मूर्खों कहां घूमते रहते हो... फेल हो जाओगे... घूमना बंद करो... एक बार कैंप के चक्कर में हमारा एक प्रैक्टिकल भी मिस हो गया था...



NSS कैंप:शंभु,ललित,विजय,शादाब,गिरि
 हमने ज्यादा मेहनत करके अगले प्रैक्टिकल में अपने नंबर कवर किए थे... जिसमें हम सभी की मदद गिरि ने ही की...


अजरा 'बाजी' के साथ गिरि
हम सभी की पढ़ाई का ये सिलसिला जारी ही था... चूंकि क्लास में लड़कियां सभी ख़ूबसूरत थीं... लिहाजा उम्र के लड़कपन में मज़ाक और हकीकत के मिले जुले रूप में रोमांस भी सामने देखा जाने लगा... हमारे गिरि साहब भी कम नहीं थे... इनका दिल कईयों पर आया... लेकिन जिस तरह की बैकग्राउंड से हम लोग आए थे, उसमें दिल की बात कभी ज़ुबान पर आ नहीं सकती थी... फिर क्या था शादाब का नाम तो कई लड़कियों से जोड़ा गया, एक-आद लड़की से तो वो भागता भी देखा गया...

गिरि साहब उर्दू की अज्ञानता के चलते अजरा को सभी की तरह आजरा बाजी कहते रहे... कुछ क्रश था इनका उनपर... लेकिन बाजी शब्द ने सारी बाजी ही पलटकर रख दी... रौनक हबीब, निखत परवीन, शाहजहां, शबनम- ख़ूसूरती में इनका कोई मुक़ाबला ही नहीं था... हमारी क्लास ही क्या... दूसरी क्लास के लड़कों का भी हमारे डिपार्टमेंट में आना-जाना बढ़ गया था...
कैशर अब्बास, मुमताज, निख़त, गिरि
क्योंकि मजाक करने में हमारी क्लास की लड़कियां किसी से भी कम नहीं थीं... लिहाजा एक शरीफ सा लड़का हुआ करता था स्वरूप डी रॉय... उसको छेड़ने का काम हमारी दबंग दोस्त कनीज़ फ़ातिमा किया करती थी... जैसे ही कनीज़ स्वरूप को कोने में चलने को कहती थी... वो थर-थर कांपने लग जाता था... भागकर गिरि के पास आकर बचाने की गुहार लगाने लगता था...


रौनक चूंकि कविताएं, शायरी में एक्टिव थी... तो हमारी क्लास के लड़कों के साथ-साथ  पड़ोसी डिपार्टमेंट के लड़के भी हमारे डिपार्टमेंट के खूब चक्कर लगाए करते थे... इसी तरह शाहजहां भी कम ख़ूबसूरत नहीं थी... इनके पीछे तो लड़कों का पूरा हुज़ूम ही पड़ा रहता था... हालांकि शाहजहां अपने इस स्टेटस को एन्जॉय भी किया करती थी... इसमें सबसे ख़ूबसूरत बात ये थी कि शाहजहां ने कभी भी इसे बताने से ग़ुरेज़ नहीं किया...

जारी...

Thursday, July 2, 2015

डिप्टी नज़ीर अहमद-जिन्होंने दिया ‘इंडियन पेनल कोड’ नाम ताज़िरात-ए-हिंद

हिंदुस्तान ने जिन्हें भुला दिया
डिप्टी नज़ीर अहमद ने दिया था इंडियन पेनल कोड नाम 

ताज़िरात-ए-हिंद 
पुरानी हिन्दी फिल्मों में आपने अक्सर जज को सज़ा सुनाते वक्त ताज़िरात-ए-हिंद  शब्द का इस्तेमाल करते हुए ज़रूर सुना होगा, लेकिन शायद ही आप इस शब्द का इज़ाद करने वाले का नाम जानते होंगे, तो चलिए आज आपको इसकी की जानकारी दी जाए...
जिस प्रकार हिन्दी साहित्य में मुंशी प्रेमचंद का नाम है, ठीक वैसे ही नाम डिप्टी नज़ीर अहमद का उर्दू साहित्य में है, चांदनी चौक की गलियों में रहकर डिप्टी नज़ीर अहमद साहब ने न जाने कितना बड़ा साहित्य रच डाला, कि आज रिसर्च करने वाले स्टुडेंट्स उस स हित्य को पता नहीं कहां-कहां से ढूंढ कर ला रहे हैं, फिर भी जितना काम नज़ीर साहब पर होना चाहिए, उतना हुआ नहीं हैं...
हालांकि मास कम्युनिकेशन का विद्यार्थी होने से पहले 2 साल तक मैं भी साहित्य का विद्यार्थी रहा हूं, लेकिन दुर्भाग्य से मुझे भी डिप्टी नज़ीर अहमद के बारे में जानकारी नहीं थी...
डिप्टी साहब की हवेली के सामने सेल्फी
मेरे एक बहुत ही अजीज़ दोस्त हैं- चंद्रशेखर मल्होत्रा (जिन्हें हम प्यार से शेखर भाई कहते हैं) शेखर भाई चांदनी चौक में अपना व्यवसाय करते हैं, 10 साल पहले तक शेखर भाई वहीं पर रहा भी करते थे, बचपन चांदनी चौक की ही गलियों में बीता है... लिहाजा चांदनी चौकी के गली कुचों से अच्छी तरह वाकिफ़ हैं, या यूं कहें कि शेखर भाई चांदनी चौक के चलते-फिरते एनसाइक्लोपीडिया हैं, तो ज्यादा ठीक होगा... बातचीत में एक दिन डिप्टी नज़ीर अहमद साहब का जिक्र आया, शेखर भाई उन्हीं की हवेली के साथ में रहते थे, कुछ वक्त पहले हवेली का पता कुछ यूं हुआ करता था- 6230, कूचा नवाब मिर्ज़ा, आज की तारीख़ में इस गली का नाम थोड़ा बदला है, गली शिवमंदिर, कटरा बडियान, दिल्ली-110006 हो गया है...  
यही वो दरवाजा है जिसकी कुंडी डिप्टी साहब ने तोड़ी थी
इस हवेली के साथ एक दिलचस्प किस्सा जुड़ा हुआ है जिसे मैं आपको जरूर बताना चाहूंगा, जब डिप्टी नज़ीर अहमद साहब की हवेली बनकर तैयार हुई, तो मेन गेट पर कारपेंटर ने ताला लगाने के लिए कुंडी लगा दी
देखिए आज भी कुंडी टूटी हुई है
इस पर डिप्टी नज़ीर अहमद साहब ने कहा कि यहां कौन चोर आ रहा है, उन्होंने अपने हाथ से उस कुंडी को तोड़ डाला, जो आज तक टूटी हुई है... ये है तो छोटी सी बात लेकिन किसी को भी जज़्बाती कर सकती है...
शेखर भाई साहित्य के प्रेमी तो हैं ही, हिन्दी में भी एमए (जामिआ) भी किया हुआ है, शेखर भाई ने ही डिप्टी नज़ीर अहमद साहब के बारे में मुझे बताया, डिप्टी नज़ीर अहमद की उस हवेली के बारे में बताया, जो चांदनी चौक में अपनी आखिरी सांसे गिन रही हैं...
हवेली की तरफ जाती गली
शेखर भाई और मैं इस मामले में थोड़े जज़्बाती हैं, जहां इतिहास अपनी आख़िरी सांसे गिन रहा हो, वहां हम ख़ामोश रह जाएं... ऐसा नहीं हो सकता...
आज भी ख़ूबसूरत दिखता है दरवाजा
शेखर भाई इस मामले में खुशनसीब रहे कि उन्होंने डिप्टी नज़ीर अहमद के पोते, जिनको सभी प्यार से बाबा कहा करते थे, बाबा आस-पास के इलाके में सबकी मदद करने के लिए पॉपुलर थे, शेखर भाई ने उनके साथ लंबा वक्त बिताया औऱ डिप्टी नज़ीर अहमद के बारे में उन्हीं के पोते से फर्स्ट हैंड जानकारी हासिल की...
इस हवेली के बारे में एक और किस्सा कहा जाता है, वो है इस हवेली के नीचे से जामा मस्जिद तक एक सुरंग जाने की कहानी, हालांकि ये बात कपोल कल्पित थी, फिर सालों तक कही जाती रही... 
आज भी हवेली का वैभव मौजूद है
डिप्टी साहब तब तक जीवित रहे वे इस हवेली पर जान छिड़कते रहे, डिप्टी साहब के बाद उनके पोते बाबा साहब भी जब तक जिंदा रहे, तब तक हवेली को मेंनटेन करते रहे, लेकिन चौथी पीढ़ी में वो जुनून की कमी है, कुछ हालात भी प्नेरतिकूल हो गए हैं...




हवेली की तरफ जाती गली
























डिप्टीशब्द की दिलचस्प कहानी
नज़ीर साहब के नाम के आगे डिप्टी शब्द जुड़ने की भी बड़ी ही दिलचस्प कहानी है...
नज़ीर अहमद साहब का जन्म 1836 में, बिजनौर जिले के रेहड में हुआ, डिप्टी साबह के पिता मौलवी सआदत अली, अरबी और फ़ारसी के बड़े जानकार थे, डिप्टी साहब ने अपनी शुरूआती तालीम अपने पिता से ही हासिल की, 1842 में जब डिप्टी साहब केवल 6 साल के ही थे, इनके पिता इन्हें दिल्ली की औरंगाबादी मस्जिद में मौलवी अब्दुल ख़ालिक़ के पास छोड़ गए, डिप्टी साहब ने मौलवी अब्दुल हक़ औरंगाबादी से अरबी, फ़ारसी और शिक्षा शास्त्र में निपुणता हासिल की, 1845 में जब डिप्टी साहब केवल 9 साल के ही थे, इनका दिल्ली कॉलेज में दाख़िला मिल गया, पढ़ाई ख़त्म करने के बाद गुजरात के एक स्कूल में 40 रुपए प्रति महीने की तनख़्वाह पर टीचर हो गए, 2 साल बाद टीचर के पद से इस्तीफ़ा देकर कानपुर आ गए, जहां डिप्टी इंस्पेक्टर आफ़ स्कूल के पद पर इनकी नियुक्ति हुई, 1857 के ग़दर के बाद इसी पद पर इलाहाबाद आ गए, ग़दर के ज़माने में इन्होंने एक अंग्रेज़ महिला की जान बचाई थी, लिहाजा इनकी प्रमोशन हो गई और डिप्टी साहब इंस्पेक्टर बना दिए गए, नज़ीर अहमद के भीतर ज्ञान अर्जित करने की अथाह भूख थी, वह कुछ भी सीखने का मौक़ा कभी हाथ से जाने नहीं देते थे, इलाहाबाद प्रवास के दौरान डिप्टी साहब ने अंग्रेज़ी भाषा पर अधिकार जमा लिया, बस फिर क्या था, निकल पड़ी गाड़ी पूरी रफ्तार से, डिप्टी साबह ने इंडियन पेनल कोड का ताज़िरात-एहिंद नाम से उर्दू में अनुवाद किया, अनुवाद से ख़ुश होकर लेफ़्निनेंट गवर्नर सर विलियम मेयर ने डिप्टी  साहब को तहसीलदार बना दिया, बाद में प्रमोशन के बाद 1863 में, जब डिप्टी साहब की उम्र मात्र 27 साल थी, कलक्टर बन गए...
डिप्टी साबह की पॉपुलेरिटी और योग्यता के बारे में जब निज़ाम हैदराबाद को पता चला तो 1877 में डिप्टी साहब  को मोटी तनख़्वाह पर अपने यहां नौकरी पर रख लिया, इसके बाद नज़ीर अहमद अब डिप्टी नज़ीर अहमद कहलाए जाने लगे थे और जीवन भर लोग इन्हें सम्मानपूर्वक इसी नाम से पुकारते रहे...


1884 में डिप्टी नज़ीर अहमद इस्तीफ़ा देकर दिल्ली चले आए, और और चांदनी चौक को ही अपना परमानेंट निवास बना लिया... चांदनी चौक आते ही डिप्टी नज़ीर अहमद की साहित्यिक सक्रियता बहुत बढ़ गई, डिप्टी साहब ने एक के बाद एक कई अहम किताबों की रचना की, डिप्टी साबह के हाथ में कपकपी का रोग राशालग गया था, ख़ुद नहीं लिख पाते थे तो दूसरों को बोलकर लिखवाते थे, उनके आख़िरी दम तक लिखने का सिलसिला बदस्तूर जारी रहा, और 1912 को डिप्टी नज़ीर अहमद साहब ने आख़िरी सांस ली...

डिप्टी नज़ीर अहमद की प्रमुख रचनाएं
उपन्यास----
मिरातुल-उरूस
बिनातुन्नआश
तौबातुन्नसूह
इब्नुल-वक़्त
मुह्सिनात
अयाम्मा
रूयाए-सादिक़ा
मुंतख़ब-अल-हिकायात
नैतिक और धार्मिक किताबें-----
अल्हुक़ूक़-वल-फ़रायज़
इज्तेहाद
मुहातुल-उम्मा
मुबादिल-हिकमत
सामावात
मोएज़-हुस्ना
चंद-पंद
व्याकरण संबंधी किताबें
रस्मुल-ख़त
सर्फ़े-सग़ीर
मायुग़्नीका-फ़िस्सर्फ़
पुरस्कार---------
शसुलउलेमा (विद्वानों में सूर्य) 1898
एडनबर्ग यूनिवर्सिटी ने एलएलडी की उपाधि दी- 1902
पंजाब यूनिवर्सिटी ने डाक्टर ऑफ़ ऑरिएंटल स्टडीज़ की मानद उपाधि प्रदान की- 1910