Sunday, July 10, 2011

क्वांटम युग

Quantum Era   (क्वांटम युग)

हमारी इस व्यापक दुनिया और उसकी क्रियाएँ कुछ भौतिक नियमों पर आधारित हैं, इसकी कल्पना एक वैज्ञानिक के अलावा किसी और व्यक्ति द्वारा कर पाना थोड़ा मुश्किल है। इन भौतिक नियमों की खोज तो गैलीलियो और न्यूटन के समय से ही प्रारंभ थी, पर उन्नीसवीं शताब्दी के शुरू होने से लेकर उसके अंत तक हमारे पास कई ऐसे नियम थे जो हमारी प्राकृतिक और भौतिक दुनिया के कार्य-कलापों की सही व्याख्या कर सकते थे। इनमें कई आज भी हमारी दुनिया को सफलतापूर्वक चला रहे हैं। 

चलती हुई गाड़ी से हमें कैसे उतरना है, सड़क को मोड़ देने के लिए Gradieant कितनी होनी चाहिए, बिल्डिंग बनाते हुए concrete  की strength  क्या होना चाहिए, कितने  voltage से कितनी current बहनी चाहिए,हवाई जहाज के निर्माण में aerodynamic सिद्धांतों का कैसे पालन किया जाता है। 

इनमें से हर चीज के लिए हमारे पास सही-सही और ठोस उत्तर हैं।  लगभगया अनुमानजैसे शब्दों का हमारी भौतिक दुनिया के नियमों से कोई वास्ता नहीं। वो दुनिया जो हमारी नजरों के सामने है, जिसकी क्रिया-कलापों को सही-सही मापा और तौला जा सकता है। 

हम शायद अपनी इस दुनिया में खुश रहते अगर उन्नीसवीं सदी के वैज्ञानिकों की जिज्ञासा ने हमारा परिचय हमारी ही भौतिक दुनिया के उस सूक्ष्म रूप से नहीं कराया होता, जिसे हम परमाणुओं की दुनिया कहते हैं। ये उन छोटे-छोटे कणों की दुनिया थी, जिन्हें हम नंगी आंखों से नहीं देख सकते थे। पर जब-जब हमने इनकी दुनिया को जानने की कोशिश की और अपने भौतिक नियमों से उनको परखना चाहा, हम असफल हुए। इन छोटे-छोटे कणों के पास गति तो थी, पर वो हमारे गति के नियम नहीं मानते थे, उनके पास आवेग यानि momentum  तो था पर उनसे पैदा हुए बल के गुण कुछ और ही थे, जो न्यूटन द्वारा प्रस्थापित ढांचे में नहीं बैठते थे।
न्यूटन ने हमें ये सिखाया कि प्रकृति के सभी कार्यों का वर्णन अच्छी तरह से निर्धारित गणित द्वारा किया जा सकता है। पर न्यूटन के सभी परिमाण, परमाणुओं की इस दुनिया में असफल साबित हुए। छोटी दुनिया की इस बड़ी चुनौती को वैज्ञानिकों ने एक नया नाम दिया-QUANTUM PHYSICS.


QUANTUM PHYSICS
 Quantum Physics े उदभव और विकास की कहानी का सबसे पहला chapter ै - Black body radiation.

(Why a black-body radiation is called a black-body radiation)

मोटे तौर पर किसी बंद भट्टी (oven) के अंदर के  thermal radiations से इसकी तुलना की जा सकती है। जब इस radiant energy  के pattern को body के temp.के बढ़ने के साथ study किया गया तो उसमें एक विशिष्ट परिमाण में frequency कंपन की दर और wavelength (प्रति-तरंग लंबाई) में बँटे ऊर्जा के pattern मिले। पर विविध लंबाई की तरंगों में कितनी विकिरण ऊर्जा बँटी होनी चाहिए, इसका जवाब classical physics के पास नहीं था।
कई वैज्ञानिकों जैसे Kirchoft, Wein आदि ने इसे समझने की कोशिश की, पर इस प्रयास में पूरी तरह से सफल नहीं हो पाए। आखिर वैज्ञानिक मैक्सप्लांक (Planck) ने ये सुझाया कि ये thermal radiation continuous नहीं बल्कि discreet packets के रूप में निकलते हैं, जिसे उन्होंने 'Quanta' कहा। उन्होंने ये बताया कि हर packet की अपनी frequency होती है और वह जो ऊर्जा धारण करता है, उस फ्रीक्वेंसी को एक निश्चित संख्या से गुणा करने पर पाया जा सकता है। और इस तरह black-body की विकीरण ऊर्जा के variable pattern को समझा जा सकता है, उनके इस निश्चित स्थिरांक को उन्हीं के नाम पर Planck's Constant कहा गया।

वैज्ञानिक मैक्सप्लांक
 Planck का ये constant 'h'  जिसका मान h 6.63 x 10-34 joules-second होता है, ने इस समस्या को सुलझा तो दिया पर ये प्रति पैकेट ऊर्जा का फार्मूला क्यों होता है, इसका जवाब Planck के पास नहीं था।

उन्नीसवीं सदी खत्म होते-होते करीब 1898 में J.J. Thomson ने electron  की खोज कर ली थी और बीसवीं सदी के आरंभ में परमाणुओं के structure (स्वरूप) की परिकल्पना जोर पकड़ने लगी थी। परमाणु के नाभिक के चारों तरफ इलेक्ट्रॉन कैसे घूमते हैं, इस पर विचार होने लगे और इसके लिए नए-नए model सुझाए जाने लगे। वैज्ञानिकों को आकर्षित किया इस Planetary model ने। पर इस model की परिकल्पना classical physics के अनुसार गलत थी। 



पर इस contradiction का कारण बना Maxwell का Electromagnetic सिद्धांत। इस सिद्धांत के अनुसार accelerated motion में किसी भी घूमते विद्युत्भारित कण यानि moving charged particle की ऊर्जा विद्युत-चुंबकीय तरंगों के रूप में निकलती है। जिसका मतलब था कि orbit में घूमता हुआ electron जो कि एक negatively charged particle है अपनी ऊर्जा को विद्युत चुंबकीय तरंगों के रूप में खोता रहेगा और अंततः spiral  करता हुआ नाभिक में जा गिरेगा। यह बहुत ही कम समय में होगा...............इसलिए इस धारणा को सच मानने का मतलब था, atom को unstable मानना, जो कि संभव नहीं था।

Maxwell

इस समस्या का समाधान निकाला डेनमार्क के वैज्ञानिक Neils Bohr  ने। Bohr तप्त Hydrogen gas से प्राप्त radiation spectrum की लाइनों का अध्ययन कर रहे थे। उन्होंने ये व्याख्या दी,  कि electron जब अपने orbit में घूमता है तो कोई ऊर्जा विकिरित नहीं करता, बल्कि वह ऊर्जा उस समय बाहर छोड़ता है जब वो एक  अधिक ऊर्जा वाले orbit से दूसरे कम ऊर्जा के orbit में jump करता है।

वह इस ऊर्जा को photon नामक एक massless particle यानि प्रकाशकण के रूप में वह बाहर निकालता है। ये energy,  packets के रूप में होती है, और इस energy  का मान निर्धारित करने के लिए Bohr ने लिया Planck  की कल्पना का सहारा।

उन्होंने कहा कि Hydrogen की spectrum में प्राप्त अलग-अलग लाइनों की frequency  को Plank के constant से गुणा किया जाए तो orbit को jump करने के दौरान electron  द्वारा बाहर छोड़ी गई ऊर्जा का हिसाब लगाया जा सकता है।


Planck  द्वारा दिया गया स्थिरांक’ (Constant)  और इसका मूल्य (value) एक ऐसा गणितीय चमत्कार था जिसने Black body radiation  को भी explain किया और Bohr ने इसकी मदद लेते हुए Planetary model  के द्वारा Hydrogen gas की spectral lines की सही व्याख्या भी कर दी। पर इन दोनों उदाहरणों में Planck  और Bohr ने 'How' (कैसे) तो explain कर दिया पर 'why' (क्यों) का जवाब उनके पास भी नहीं था।


सवाल था कि आखिर क्यूँ particle  होते हुए भी, electron, electromagnetic theory पर खरा नहीं उतर रहा था। क्योंकि हर charged particle  जो move कर रहा है उसे मैक्सबेल की electro-magnetic theory का पालन करना चाहिए,


जो कि एक सत्यापित भौतिक नियम है। तो क्या इसका मतलब ये था कि orbit  में घूमते वक्त electron  एक particle की तरह व्यवहार नहीं करता ? इस अजीब से सवाल का उतना ही अजीब जवाब भी था। जवाब था कि orbit में घूमते वक्त electron एक particle या matter की तरह नहीं बल्कि एक wave की तरह व्यवहार करता है। और ये जवाब जिस वैज्ञानिक ने ढूंढा, उसका नाम था - De-broglie.

De-broglie
 De-broglie की इस धारणा से पहले आइंस्टाइन ने 1905 में एक क्रांतिकारी धारणा पहले ही दे दी थी कि प्रकाश की तरंगे एक कणों के समूह की तरह व्यवहार करती हैं। आइंस्टाइन की ये धारणा प्रायोगिक तौर पर भी सही पाई गई, जब प्रकाश की तरंगे एक metal (धातु) के Plate पर डाली गईं तो उससे इलेक्ट्रॉन बाहर निकल पड़े जिनको electric current के रूप में measure भी किया गया। आइंस्टाइन ने इसकी व्याख्या इस तरह से की, कि प्रकाश एक particle के रूप में metal से टकराकर अपनी ऊर्जा electron को दे देता है और उस ऊर्जा को लेकर electron, metal से बाहर निकल जाता है। आइंस्टाइन का ये सिद्धांत Photo-electric effect के नाम से मशहूर हुआ जिसके लिए उन्हें Nobel Prize से भी नवाजा गया। Photo-electric effect के कई उदाहरण हम आम जिंदगी में हर रोज देख सकते हैं, खासकर photo sensors से जुड़े किसी भी application  में इसका अनुभव किया जा सकता है। आइंस्टाइन की इस अवधारणा के बाद Light wave के photon  के रूप में यानि matter की तरह व्यवहार करने में कोई संदेह नहीं रहा।

उधर De-broglie ने अपनी परिकल्पना को एक गणितीय रूप दिया था जिसमें उन्होंने कहा कि electron जब एक wave की तरह व्यवहार करेगा तो उसका wavelength, Planck के Constant को उसके momentum  से divide करने पर प्राप्त होगा। Electron कणों के इस wave nature को De-broglie ने 100 electron volt की ऊर्जा वाले electron के crystal differaction द्वारा साबित किया, जहां उन्हें किसी wave की तरह ही electron के भी differaction pattern मिले।


De-broglie  के इस सिद्धांत ने Bohr के atomic model  को सही पीठिका दी थी, जिसके अनुसार हर orbit  को एक अलग-अलग मान (value) के energy levels के रूप में माना जा सकता है, और electron  जब ऊर्जा की ऊँची सतह से निचली सतह पर कुदान करता है तो energy  एक packet  के रूप में release  करता है जो photon यानि Light के रूप में दिखाई देती है।  साथ ही साथ ये धारणा भी प्रयोग के तौर पर सही पाई
गई कि photon द्वारा योग्य परिमाण में ऊर्जा दिए जाने पर electron निचली सतह से ऊपरी सतह में भी जा सकता है। परमाणु में ऊर्जा की विभिन्न सतहों में electron के होने की परिकल्पना ने एक और आविष्कार को जन्म दिया, जिसे हम LASER के नाम से जानते हैं। आज Quantum Physics की इस अहम् देन से हम सब वाकिफ हैं चाहे वो इंजिनियरिंग का क्षेत्र हो या फिर Medical Science का।
Quantum Physics की इस दुनिया में हमने wave को particle और particle को wave की तरह व्यवहार करने की आजादी तो दे दी, पर कब वो ऐसा करेंगे यानि कब particle, wave की तरह व्यवहार करेगा और wave  particle की तरह, इसका कोई ठोस जवाब हमारे पास नहीं था, और ना ही आज है। Stern – Gerlach  नामक वैज्ञानिक भी अपने मशहूर double slit experiment द्वारा सिर्फ यही साबित कर पाए कि Electron का wave या particle के रूप में व्यवहार निश्चित रूप से निर्धारित नहीं किया जा सकता यानि electron का इनमें से किसी भी रूप में व्यवहार करना probability यानि संभावना पर आधारित है।

De-broglie के matter wave (particle wave) के wavelength को निर्धारित करने वाले फार्मूले (wavelength=h/p) के आधार पर ये कहा जा सकता था कि अगर particle का momentum बहुत ज्यादा होगा तो wavelength काफी कम और उस हालत में particle का position काफी हद तक निर्धारित किया जा सकता है क्योंकि उस वक्त यह एक point particle की तरह व्यवहार करेगा। दूसरी तरफ, अगर momentum काफी कम हो तो wavelength काफी ज्यादा होगा जिसका मतलब था कि particle, wave की तरह ज्यादा space occupy करेगा और एक wave की तरह व्यवहार करेगा।

1925 में Heisenberg ने इस व्याख्या को uncertainly principle का नाम दिया और इसको निर्धारित करने के लिए एक गणितीय formula भी दिया (êp êx = h),  जिसके अनुसार particle का position और momentum  दोनों एक साथ सटीकता के साथ नहीं मापे जा सकते और ये गणितीय formula  इसी अनिश्चितता को मापने का एक तरीका था। 
इसे हम इस तरह से समझ सकते हैं - मान लीजिए हम electron  की position निर्धारित करने के लिए अगर प्रकाश डालें, तो electron का वास्तुमान इतना हल्का होता है कि प्रकाश की तरंगे उसे खिसका देंगी, इसलिए उसके position  को हम precisely बता नहीं सकते......... )

Wave-particle duality   और uncertainty से होती हुई Quantum Physics अंततः उस जगह पहुँची जहां particle के wave nature  और उसके व्यवहार को ठीक से समझने की जरूरत हुई, एक ऐसे mathematical स्वरूप की आवश्यकता महसूस हुई, जो इसे हर तरह से, हर condition  के लिए define  कर सके। और Heisenberg  के uncertainty principle  देने के ठीक साल-भर के अंदर ही schrodinger  नामक वैज्ञानिक ये गणितीय हल दे दिया जो हर particle  के wave characteristic को बखूबी दर्शा सके। और आज 80 सालों के बाद भी Schrodinger का wave equation अनेक समस्याओं का हल देता चला आ रहा है। तब से  लेकर आज तक हालांकि Quantum Physics की यात्रा जारी है, पर इसमें कुछ नये मोड़ भी आए हैं। 

Bohr के Hydrogen atom के model पर काम  करने वालों को उस वक्त कुछ नए धारणाओं की जरूरत महसूस हुई जब कुछ complex atoms की spectral lines को नापा गया और एक ही orbit के electrons के व्यवहार में अंतर पाया गया। कुछ दशाओं में ये पाया गया कि एक ही orbit के दो electrons बाकी सारे मापदण्डों में बराबर होने पर भी व्यवहार में अंतर दिखा रहे हैं। इसका मतलब था कि इलेक्ट्रॉन कणों का कोई और ऐसा गुण है जो तब तक पता नहीं था। और ये गुण था 'spin'. यानि electron का अपने axis पर भी घूमना। और फिर ये पाया गया कि दो electrons  के behavior में अंतर  'spin'  के अलग-अलग दिशाओं की वजह से भी हो सकता है।


इसकी मदद लेकर Pauli नाम के वैज्ञानिक ने exclusion का सिद्धांत दिया, जिसके मुताबिक कोई भी दो electron एक ही क्वांटम स्थिति में नहीं हो सकते, अर्थात् उनकी ऊर्जा (energy), आवेग (momentum)  और स्पिन में कहीं न कहीं अंतर होगा। 

Electron  के spin की धारणा ने Quantum Physics को भी एक नया spin दिया। electron जैसे कणों का spin पूरा है या आधा (integral or non-integral), इन दो संभावनाओं को लेकर भी गणित के इस्तेमाल द्वारा एक नये विषय की नींव पड़ी जिसे Quantum Statistics कहते हैं। और इसके द्वारा matter (particle) के अलग-अलग व्यवहारों की व्याख्या करने की कोशिश की गई।



 
पर छोटे-छोटे particles की दुनिया की व्याख्या करने वाली Quantum Physics के गणितीय फार्मूलों और धारणाओं का इस्तेमाल कभी-कभी एक बड़े वस्तुमान mass के व्यवहार को समझने में भी किया जा सकता है,  इसका सुबूत दिया भारत में जन्में वैज्ञानिक Subramanyam Chandra Shekhar  ने, जिसके लिए उन्हें Nobel Prize भी मिला। जब सूरज जैसा तारा अपनी सारी नाभिकीय ऊर्जा प्रकाशित कर चुकता है तो उसका गुरूत्वीय आकुंचन होते होते उसके सभी इलेक्ट्रॉन इतने पास-पास ठूंसे जाते हैं कि पावली के नियम का परिणाम दिखाई देता है यानि और अधिक ठूँसने की संभावना न रहने से तारे का आकुंचन रूक जाता है। ऐसी स्थिर अवस्था में आये तारे को White Dwarf  कहते हैं। पर पावली का नियम लागू होने के लिये यह जरूरी है कि तारे का वस्तुमान एक निश्चित सीमा से अधिक न हो। इस सीमा या limitation को चन्द्रशेखर limit कहते हैं क्योंकि इसे निर्धारित करने का काम चन्द्रशेखर ने किया था।


Subramanyam Chandra Shekhar  
 लेकिन इन सफलताओं के बावजूद आइंस्टाइन क्वांटम फिजिक्स को परिपूर्ण नहीं मानते थे न तो Bhor और उनकी Quantum Physics की Probability  वाली दुनिया को स्वीकार ही कर पाते थे। उन्होंने कहा भी था कि "God doesn't play dice with the universe." यानि भगवान हमारी दुनिया के निर्णय पासे फेंक कर नहीं करता। कहीं कोई निश्चित pattern है जिसे हम अब तक नहीं ढूंढ पाए हैं। इसलिए वह अनिश्चित लगता है। क्या आइंस्टाइन की यह धारणा सही थी ? कहीं कोई ऐसा नियम है, कोई ऐसा सूत्र है जिनसे सारे नियम निकलते हैं। चाहे वो भौतिक दुनिया के हों, या परमाणुओं की दुनिया के। आइंस्टाइन से असहमत रहने वाले भी यह मानते हैं कि Quantum Physics की नींव अभी सुदृढ़ नहीं है। संभावनाओं पर आधारित समीकरणों की मदद से अब तक ‘how’ यानि कैसेका जवाब तो काफी हद तक इसने ढूंढ लिया गया है। पिछले दो दशकों में वैज्ञानिक John Bell के  गणित पर आधारित कुछ प्रयोगों ने ऐसे दृढ़ संकेत (definite indications) दिए हैं जो 'Bohr' द्वारा प्रस्थापित संभावनाओं पर आधारित सूक्ष्म दुनिया के इस चित्र को काफी हद तक सही ठहराते हैं। पर क्योंकी तलाश अब भी जारी है।